प्रदत्ते द्विषतेऽमुष्मिन् विमुक्त श्वेत् स पार्थिवः। तर्हि दत्तोपि भवता न दत्तः सिह्यपर्वतः ॥
शत्रु को इस सिंहगढ़ दुर्ग को देकर यदि शहाजी राजा मुक्त हो गये तो आपके द्वारा प्रदत्त सिंहगढ़ दुर्ग न दिये के समान है।
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