अप्रमत्तोपि यो मत्तो द्विषते सिह्मपर्वतम्। आदापयद्येदिलाय किं वक्ष्ये तं महाव्रतम्।।
ज्ञानी होते हुए भी जिस पागल ने शत्रु आदिलशाह को मेरे से सिंहगड़ दुर्ग दिलवाया, ऐसे महाव्रती पुरुष को मैं क्या कहूँ?
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