समं च विषमं चेति वैरं द्विविधमुच्यते। प्रथमं तु समेनाहुर्द्वितीयमधिकेन चेत्।।
सम और विषम ये दो प्रकार की शत्रुता कही गयी है। समान शत्रु के साथ शत्रुता यह पहली एवं बलवान् शत्रु के साथ शत्रुता यह दूसरी प्रकार की शत्रुता कही गई है।
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