सुवर्णशर्मा उवाच-
दुरन्तं बलवद्वैरं दुरन्तः पापसञ्चयः। दुरन्ताभ्यर्हितां गर्दा दुरन्ता गुरुगर्हणा।।
सोनोपंत बोला - बलवान् से शत्रुता, पापों का संचय, पूज्यों की एवं पिता की निन्दा, इन सबका परिणाम दुःखदाय होता है।
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