दिने दिने भवन्नूनः समः साम्यं विमुञ्चति । आधिक्यं चाधिको येन को भेदं न प्रशंसति ।।
जिस भेदनीति के अनुसरण से सम शत्रु प्रतिदिन न्यूनता को प्राप्त होकर समानता को छोड़ देता है और अत्यधिक बलशाली शत्रु अपने आधिक्य को छोड़ देता है, अतः उस भेद की कौन प्रशंसा नहीं करता है?
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