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शिवभारतम् • अध्याय 16 • श्लोक 45
सप्ताङ्गस्यास्य राज्यस्य धर्म आत्माऽभिधीयते। मन्त्रः प्राणो बलं नीतिरनीतिरसमर्थता ।। दण्डो यथोचितः शौर्यमधर्मो रिपुरुद्धतः। मदः परस्परं भेदो दीर्घमायुरभेद्यता ।। जनरञ्जनमुत्कर्षो दर्शनं दीर्घदर्शिता। प्रतापः प्रोज्वलं रूपं विमला बुद्धिरायुधम्।। तथैव बलवद्वैरमन्तरायः प्रकीर्तितः । प्रमादस्तुभवेन्निद्रा प्रबोधः सावधनता।।
इन सात अंगों से युक्त राज्य का धर्म आत्मा है, मन्त्र प्राण है, नीति यह बल है और अनीति दुर्बलता है। यथोचित दण्ड विधान यह शौर्य, शत्रु की उद्दण्डता अधर्म, आपस में भेद करना यह मद, दृढता, दीर्घायु है, लोकानुरंजन उत्कर्ष, दूरदर्शिता ही दृष्टि है, पराक्रम यह उज्ज्वल स्वरूप, आयुध यह विमल बुद्धि, उसी प्रकार बलवान् के साथ शत्रुता विघ्न कहा गया है, प्रमाद यह निन्द्रा और सावधानी यह जागृत अवस्था कही गई है।
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