ऊनोपि यदि दूनोयमिति मत्वाऽनुनीयते। ततिः श्लाध्यमानोऽसौ स्वमेव बहुमन्यते ।।
यह दुःखी है, इस प्रकार मानते हुए यदि न्यून सामर्थ्यवान् शत्रु की सांत्वना की जाए तो वह अपने आपमें प्रशंसनीय होकर, अपने को बड़ा समझने लगता है।
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