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शिवभारतम् • अध्याय 16 • श्लोक 35
ततो मुञ्युत्यमुं केऽपि केऽप्यमुष्मिन्नुदासते। केचिद्विपक्षपक्षांतर्निपत्य सुखमासते ।। प्रकोपनममुं मत्वा शपन्त्येव तु केचन। भजन्ति न यथापूर्वमत्यजन्तोऽपि केचन ।।
तत्पश्चात् कुछ लोग उसको छोड़ देते हैं, कुछ उसके प्रति उदासीन रहते है, कुछ उसके शत्रुपक्ष के साथ मिलकर सुख से रहते हैं, कुछ उसको क्रोधी समझकर शाप देते हैं और कुछ उसको न छोड़ते हुए भी पहले की तरह उसकी सेवा नहीं करते है।
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