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अध्याय 4 — चतुर्थः खण्डः

जाबाल दर्शन
62 श्लोक • केवल अनुवाद
हे सांकृते! यह मानव शरीर अपने हाथ की माप से ९६ अंगुल का होता है। इस शरीर के मध्य भाग में अग्नि का स्थान निहित है। उसका वर्ण तपाये हुए स्वर्ण के सदृश कहा गया है।
उसकी त्रिकोण आकृति है। यह हमने यथार्थ बात ही तुमसे बतायी है। गुदा भाग से दो अंगुल ऊर्ध्व की ओर तथा लिङ्ग से दो अंगुल नोचे की ओर जो स्थान है,
उसे ही मनुष्य-देह का मध्य भाग समझना चाहिए। वही मूलाधार है, पर हे मुनिश्रेष्ठ। इस स्थान से नौ अंगुल ऊर्ध्व में कन्द स्थान है।
उस कन्द की लम्बाई-चौड़ाई चार-चार अंगुल की है तथा उसकी आकृति मुर्गी के अण्डे की भाँति है। वह ऊपर से चमड़े आदि के द्वारा सुसज्जित है।
हे मुनि पुङ्गव! उस कन्द स्थान के मध्य भाग में नाभि केन्द्र है, ऐसा योग विज्ञानियों ने कहा है। कन्द के बीच में जो नाड़ी स्थित है, उसका 'सुषुम्ना' के नाम से उलेख किया गया है।
उस कन्द के चारों तरफ ७२ हजार नाड़ियों का समूह स्थित है।
उनमें सुषुम्रा, पिङ्गला, इड़ा, सरस्वती, वरुणा, पूषा, यशस्विनी, हस्तिजिह्ना,
अलम्बुसा, कुरु, विश्वोदरा, पयस्विनी, शंखिनी और गान्धारी - ये चौदह नाड़ियाँ प्रमुख मानी गयी है।
इन चौदह नाड़ियों में भी प्रथम तीन ही सबसे प्रमुख हैं। इन तीनों में भी एक ही नाड़ी 'सुषुम्ना' सर्वश्रेष्ठ मानी गई है। शास्त्रज्ञों ने इसे 'ब्रह्मनाड़ी' के नाम से सम्बोधित किया है ।
पीठ के मध्य में जो वीणा दण्ड (मेरुदण्ड) नाम से प्रसिद्ध है, वही हड्डियों का समुच्चय है। इससे होकर सुषुम्ना नाड़ी मस्तिष्क तक पहुँचती है।
हे मुनीश्वर! नाभि-कन्द से दो अंगुल नीचे कुण्डलिनी स्थित है। इसको अष्टप्रकृति रूपा (पृथ्वी, जल, तेज, वायु, आकाश, मन, बुद्धि और अहंकारयुक्त) कहा गया है।
वह वायु-चेष्टा, जल और अन्न आदि का अवरोध करके सदैव नाभिकन्द के पाश्चर्यों को चारों ओर से आच्छादित करके विद्यमान रहती है।
हे मुने! कुण्डलिनी अपने मुख से ब्रह्मरन्ध्र के मुख को ढक कर रखती है। सुषुम्रा के बायें भाग में इड़ा और दाहिने भाग में पिङ्गला स्थित है।
सरस्वती और कुरु सुषुम्ना के दोनों पाचों में स्थित हैं। इड़ा के पृष्ठ भाग में गान्धारी तथा पूर्व भाग में हस्तिजिह्वा प्रतिष्ठित है।
पिङ्गला के पृष्ठ भाग में 'पूषा' और पूर्व भाग में 'यशस्विनी' स्थित है। कुहू और हस्तिजिह्वा के मध्य 'विश्वोदरी' नाड़ी विद्यमान है।
यशस्विनी और कुहू के मध्य भाग में 'वरुणा' नाड़ी स्थित है। 'पयस्विनी' नाड़ी की स्थिति पूषा और सरस्वती के बीच में कही गई है।
'शङ्खिनी' का स्थान गान्धारी और सरस्वती के बीच में है। 'अलम्बुसा' नाभिकन्द के मध्य भाग से होती हुई गुदा तक व्यात है।
सुषुम्ना का द्वितीय नाम 'राका' है, उसके पूर्वी क्षेत्र में 'कुडू' नाम की नाड़ी है। यह नाड़ी ऊर्ध्वं एवं अप: दोनों और प्रतिष्ठित है। इसकी स्थिति दाहिनी नासिका तक कही गयी है।
इड़ा नामक नाड़ी बाईं नासिका तक स्थित है। यशस्विनी नाड़ी बायें पैर के अंगूठे तक व्याप्त है। पूषा पिङ्गला के पृष्ठ भाग से होती हुई बायें नेत्र तक पहुँचती है और पयस्विनी विद्वजन्नों द्वारा दाहिने कान तक फैली हुई बताई गयी है।
सरस्वती नाड़ी ऊपर की ओर जिह्वा तक व्याप्त है। हस्तिजिह्वा नाड़ी बायें पैर के अंगूठे तक फैली है।
'शङ्खिनी' नाम की नाड़ी बायें कान तक स्थित है। विशेषज्ञो के द्वारा 'गान्धारी' नाड़ी की स्थिति बायें नेत्र तक व्याप्त बतायी गई है।
'विश्वोदरा' की स्थिति नाभिकन्द के बीच में कही गयी है। प्राण, अपान, व्यान, समान, उदान,
नाग, कूर्म, कृकर (कृकल), देवदत्त और धनञ्जय - ये दस प्राण वायु बताये गये हैं। ये प्राण समस्त नस-नाड़ियों में संचरित होते हैं।
इन दसों में प्राण आदि पाँच वायु ही प्रमुख हैं। हे मुने! इन पाँचों में भी प्राण और अपान को ही सर्वाधिक महत्त्व प्रदान किया गया है।
इनमें से प्राण नामक वायु नासिका एवं मुख के बीच में, नाभि के मध्यभाग में और हृदय में हमेशा निवास करता है।
अपान वायु गुदा, लिङ्ग, जांघों, घुटनों, समस्त उदर, कटि, नाभि तथा पिण्डलियों में भी सदा स्थित रहता है।
व्यान वायु दोनों कानों, दोनों चक्षुओं, दोनों कन्धों, दोनों टखनों, प्राण के स्थानों और कंठ में भी व्याप्त रहता है।
उदान वायु की स्थिति दोनों हाथों एवं पैरों में समझनी चाहिए। समान वायु निःसन्देह समस्त शरीर में फैल कर रहता है।
नाग आदि पाँचों वायु त्वचा एवं अस्थि में निवास करते हैं। हे सांकृते! उच्छ्वास अर्थात् श्वास को अन्दर की ओर खींचना, निःश्वास अर्थात् श्वास को बाहर निकालना तथा खाँसना, ये तीनों कार्य प्राण वायु में द्वारा सम्पन होते हैं।
मल-मूत्रादि कार्य का परित्याग अपान वायु के द्वारा होता है। हे मुनि पुङ्गव! समान वायु सम्पूर्ण शरीर को सम अवस्था में बनाये रखता है।
उदान वायु ही ऊर्ध्व की ओर प्रस्थान करता है। वेदान्त तत्व के विशेषज्ञ विद्वज्जनों का मानना है कि व्यान वायु ही ध्वनि का व्यञ्जक है।
डकार, वमन आदि का कार्य नाग वायु के द्वारा पूर्ण होता है। इस सम्पूर्ण देह में सौन्दर्य आदि का सम्पादन धनञ्जन वायु का कार्य कहा गया है।
आँखों का खोलना और मूंदना आदि कूर्म नामक वायु की प्रेरणा से सम्पन्न होता है। कुकर (कृकल) नामक वायु के द्वारा भूख-प्यास की इच्छा होती है तथा तन्द्रा-आलस्य देवदत्त वायु का कार्य कहा गया है।
हे मुनीश्वर! सुषुम्ना नाड़ी के अधिष्ठाता देव शिव और इड़ा के देवता विष्णु तथा पिङ्गला नाड़ी के देवता भगवान् ब्रह्माजी हैं।
सरस्वती नाड़ी के देवता विराट् हैं। पूषा नाड़ी के देवता पूषा नाम से युक्त आदित्य हैं। वरुणा के वायु देवता हैं। हस्तिजिह्ना नाड़ी के देवता वरुण हैं।
हे श्रेष्ठ मुने! भगवान् भास्कर यशस्विनी नाड़ी के देवता हैं। अलम्बुसा नाड़ी के देवता भी जलस्वरूप वरुण कहे गये हैं।
कुहू नाड़ी की अधिष्ठात्री क्षुधा देवी हैं। गान्धारी के देवता चन्द्रमा हैं। ऐसे ही शंखिनी नाड़ी के देवता भी चन्द्रमा को कहा गया है। पयस्विनी नामक नाड़ी के देवता प्रजापति हैं।
विश्वोदरा नाड़ी के देवता भगवान् अग्निदेव हैं। हे वेदवेत्ताओं में श्रेष्ठ महर्षे! चन्द्रमा देवता सदा ही इड़ा नामक नाड़ी में और
सूर्य देवता पिङ्गला नाम वाली नाड़ी में संचरित होते हैं। पिङ्गला नाड़ी से इड़ा नाड़ी में जो संवत्सरात्मक प्राणमय सूर्य का संक्रमण होता है
उसे विद्वज्जन महर्षियों ने उत्तरायण की संज्ञा प्रदान की है। इसी भाँति इड़ा से पिङ्गला में जो प्राणमय सूर्य का संक्रमण होता है,
उसे दक्षिणायन के नाम से व्यक्त किया है। जब प्राण इड़ा और पिङ्गला की संधि में गमन करता है, तब उस समय हे महर्षे! इस देह के अन्दर अमावस्या कही गई है।
जब प्राण मूलाधार में प्रविष्ट होता है, तब हे विद्वद्वर!
तपस्वियों ने आद्य विषुव नामक योग का प्राकट्य कहा है। हे श्रेष्ठ मुने! जब प्राणवायु सहस्रार चक्र में प्रविष्ट होता है,
तब उस समय श्रेष्ठ तत्त्व का विचार करते हुए महान् ऋषियों ने अन्तिम विषुव योग की स्थिति कही है। सभी उच्छ्वास एवं निः श्वास मास-संक्रान्ति माने गये हैं।
हे तत्त्वज्ञ शिरोमणे! जब प्राण इड़ा नाड़ी के माध्यम से कुण्डलिनी के पास आ जाता है, तब उस समय को चन्द्रग्रहण-काल कहा जाता है।
ठीक ऐसे ही जब प्राण पिङ्गला नाड़ी के माध्यम से कुण्डलिनी के क्षेत्र में आता है, तभी हे मुने! सूर्य ग्रहण का समय होता है।
अपने इस देह में सिर के स्थान पर श्रीशैल नाम से युक्त तीर्थ स्थित है। ललाट में केदार तीर्थ प्रतिष्ठित है। हे महाप्राज्ञ ! नासिका एवं भृकुटी (दोनों भौंहों) के बीच में काशीपुरी स्थित है।
स्तन-द्वय मण्डलों में कुरुक्षेत्र का निवास है। कमलरूपी हृदय में तीर्थराज प्रयाग स्थापित है। हृदय के मध्यक्षेत्र में चिदम्बर तीर्थ विद्यमान है। मूलाधार-स्थान में कमलालय तीर्थ की स्थापना की गयी है।
जो ऐसे श्रेष्ठ आत्मतीर्थ का त्याग करके बाह्य क्षेत्र के तीर्थों में भ्रमण करता रहता है, वह हाथ में रखे हुए बहुमूल्य रत्न का परित्याग करके काँच को ही ढूँढ़ता रहता है।
भावतीर्थ ही सबसे उत्तम तीर्थ है। पत्नी एवं पुत्री दोनों का ही आलिङ्गन किया जाता है; किन्तु दोनों में भावना का बहुत अधिक अन्तर होता है, पत्नी का आलिङ्गन दूसरे भाव से और पुत्री का आलिङ्गन दूसरे भाव से किया जाता है।
योगी मनुष्य अपने आत्मा के तीर्थ में ज्यादा से ज्यादा विश्वास एवं श्रद्धा रखने के कारण जल से पूर्ण तीर्थों एवं काष्ठ आदि से विनिर्मित देव-प्रतिमाओं की शरण नहीं प्राप्त करते।
बाह्य जगत् के तीर्थ से अन्तः क्षेत्र के तीर्थ अति श्रेष्ठ हैं, ये महातीर्थ हैं, इन आन्तरिक तीर्थों के समक्ष अन्य सभी तीर्थ व्यर्थ हैं।
शरीर के अन्दर निवास करने वाला प्रदूषित चित्त बाहर के तीर्थों में गोते लगाने मात्र से पवित्र नहीं होता; क्योंकि मदिरा से भरा हुआ घड़ा ऊपर से सैकड़ों बार पवित्र जल में धोया जाये, तब भी उस घड़े के अन्दर मदिरा के रहने से वह अपवित्र ही बना रहता है।
अपने शरीर में ही जो विषुव योग, उत्तरायण एवं दक्षिणायन काल तथा सूर्य-चन्द्रमा के ग्रहण हैं, उनमें नासिका एवं भौहों के मध्य में वाराणसी आदि तीथों में भावनापूर्वक स्नान करके मनुष्य पवित्र हो सकता है।
अज्ञानियों के अन्तःकरण की शुद्धि के लिए ज्ञानयोगियों के चरणों का जल ही उत्तम तीर्थ रूप है।
इसी शरीर में भगवान् शिव के रूप में परमात्मसत्ता विद्यमान है। इन भगवान् शिव को न जानने वाला मूढ़, अज्ञानी मनुष्य तीर्थ, दान, जप, यज्ञ, काष्ठ एवं पत्थर में ही सदैव भगवान् को ढूँढ़ता रहता है ।
जो अपने अन्तःकरण में नित्य-सतत स्थिर रहने वाले मुझ परमात्मतत्त्व की अवहेलना करके केवल मात्र बाहर की स्थूल प्रतिमाओं का ही सेवन करता है, वह हाथ में रखे हुए अन्न के ग्रास को फेंककर केवल अपनी कोहनी ही चाटता रहता है।
योगी मनुष्य अपनी आत्मा में ही भगवान् शिव का दर्शन करते हैं, प्रस्तर खण्ड एवं काष्ठ से विनिर्मित प्रतिमाओं में नहीं। अज्ञानी मनुष्यों के हृदयों में भगवान् शिव के प्रति भावना जाग्रत् करने के लिए ही प्रतिमाओं की कल्पना की गयी है।
जिससे भिन्न न कोई पूर्व (कारण) है और न ही पर (कार्य) ही है। जो सत्यस्वरूप, अनुपम और प्रज्ञान घनस्वरूप है, ऐसे उस आनन्दमय ब्रह्म को जो स्वयं अपने आत्मा के रूप में दृष्टिपात करता है, वही वास्तव में यथार्थ देखता है।
हे महामुने! यह मानव शरीर नाड़ियों का समुदाय मात्र है, जो सदा ही सारहीन है। इसके प्रति आत्मभाव का परित्याग करके बुद्धि के द्वारा यह निश्चय करो कि मैं स्वयं ही परमात्म स्वरूप हूँ।
जो इस शरीर में रहकर भी इससे सदा ही पृथक् है, महान् है, व्यापक है तथा सभी का ईश्वर है, उस आनन्दस्वरूप शाश्वत परमात्म तत्त्व को जानकर बुद्धिमान् धीर पुरुष कभी भी शोक को नहीं प्राप्त होता।
हे श्रेष्ठ मुने! सद्ज्ञान के बल से भेदजनक अज्ञान का विनाश हो जाने पर कौन आत्मा एवं ब्रह्म में मिध्या भेद की बात कहेगा।
Krishjan
धर्म का अन्वेषण
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