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जाबाल दर्शन • अध्याय 4 • श्लोक 54
विषुवायनकालेषु ग्रहणे चान्तरे सदा। वाराणस्यादिके स्थाने स्नात्वा शुद्धो भवेन्नरः ॥
अपने शरीर में ही जो विषुव योग, उत्तरायण एवं दक्षिणायन काल तथा सूर्य-चन्द्रमा के ग्रहण हैं, उनमें नासिका एवं भौहों के मध्य में वाराणसी आदि तीथों में भावनापूर्वक स्नान करके मनुष्य पवित्र हो सकता है।
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