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जाबाल दर्शन • अध्याय 4 • श्लोक 60
नाडीपुचं सदाऽसारं नरभावं महामुने। समुत्सृज्यात्मनाऽऽत्मानमहमित्येव धारय ॥
हे महामुने! यह मानव शरीर नाड़ियों का समुदाय मात्र है, जो सदा ही सारहीन है। इसके प्रति आत्मभाव का परित्याग करके बुद्धि के द्वारा यह निश्चय करो कि मैं स्वयं ही परमात्म स्वरूप हूँ।
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