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जाबाल दर्शन • अध्याय 4 • श्लोक 2
त्रिकोणं मनुजानां तु सत्यमुक्तं हि सांकृते। गुदात्तु द्वयङ्गलादूवं मेदात्तु द्वयङ्गुलादधः ॥
उसकी त्रिकोण आकृति है। यह हमने यथार्थ बात ही तुमसे बतायी है। गुदा भाग से दो अंगुल ऊर्ध्व की ओर तथा लिङ्ग से दो अंगुल नोचे की ओर जो स्थान है,
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