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जाबाल दर्शन • अध्याय 4 • श्लोक 19
इडा तु सव्यनासान्तं संस्थिता मुनिपुङ्गव। यशस्विनी च वामस्य पादाङ्गुष्ठान्तमिष्यते ॥ बामाक्षिपर्यन्ता पिङ्गलायास्तु पृष्ठतः। पयस्विनी च चाप्यस्य कर्णान्तं प्रोच्यते बुधैः ॥
इड़ा नामक नाड़ी बाईं नासिका तक स्थित है। यशस्विनी नाड़ी बायें पैर के अंगूठे तक व्याप्त है। पूषा पिङ्गला के पृष्ठ भाग से होती हुई बायें नेत्र तक पहुँचती है और पयस्विनी विद्वजन्नों द्वारा दाहिने कान तक फैली हुई बताई गयी है।
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