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जाबाल दर्शन • अध्याय 4 • श्लोक 26
अपानो वर्तते नित्यं गुदमध्योरुजानुषु। उदरे सकले कट्यां नाभौ जसे च सुव्रत ॥
अपान वायु गुदा, लिङ्ग, जांघों, घुटनों, समस्त उदर, कटि, नाभि तथा पिण्डलियों में भी सदा स्थित रहता है।
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