यथावद्वायुचेष्टां च जलान्नादीनि नित्यशः । परितः कन्दपाश्र्श्वेषु निरुध्यैव सदा स्थिता ॥
वह वायु-चेष्टा, जल और अन्न आदि का अवरोध करके सदैव नाभिकन्द के पाश्चर्यों को चारों ओर से आच्छादित करके विद्यमान रहती है।
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