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जाबाल दर्शन • अध्याय 4 • श्लोक 55
ज्ञानयोगपराणां तु पादप्रक्षालितं जलम्। भावशुद्धयर्थमज्ञानां तत्तीर्थं मुनिपुङ्गव ॥
अज्ञानियों के अन्तःकरण की शुद्धि के लिए ज्ञानयोगियों के चरणों का जल ही उत्तम तीर्थ रूप है।
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