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जाबाल दर्शन • अध्याय 4 • श्लोक 57
अन्तःस्थं मां परित्यज्य बहिष्ठं यस्तु सेवते । हस्तस्थं पिण्डमुत्सृज्य लिहेत्कूर्परमात्मनः ॥
जो अपने अन्तःकरण में नित्य-सतत स्थिर रहने वाले मुझ परमात्मतत्त्व की अवहेलना करके केवल मात्र बाहर की स्थूल प्रतिमाओं का ही सेवन करता है, वह हाथ में रखे हुए अन्न के ग्रास को फेंककर केवल अपनी कोहनी ही चाटता रहता है।
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