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जाबाल दर्शन • अध्याय 4 • श्लोक 53
चित्तमन्तर्गतं दुष्टं तीर्थस्त्रानैर्न शुध्यति । शतशोऽपि जलैौँतं सुराभाण्डमिवाशुचि ॥
शरीर के अन्दर निवास करने वाला प्रदूषित चित्त बाहर के तीर्थों में गोते लगाने मात्र से पवित्र नहीं होता; क्योंकि मदिरा से भरा हुआ घड़ा ऊपर से सैकड़ों बार पवित्र जल में धोया जाये, तब भी उस घड़े के अन्दर मदिरा के रहने से वह अपवित्र ही बना रहता है।
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