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जाबाल दर्शन • अध्याय 4 • श्लोक 33
निमीलनादि कूर्मस्य क्षुधा तु कृकरस्य च। देवदत्तस्य विप्रेन्द्र तन्द्रीकर्म प्रकीर्तितम् ॥
आँखों का खोलना और मूंदना आदि कूर्म नामक वायु की प्रेरणा से सम्पन्न होता है। कुकर (कृकल) नामक वायु के द्वारा भूख-प्यास की इच्छा होती है तथा तन्द्रा-आलस्य देवदत्त वायु का कार्य कहा गया है।
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