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जाबाल दर्शन • अध्याय 4 • श्लोक 3
देहमध्यं मुनिप्रोक्तमनुजानीहि सांकृते। कन्दस्थानं मुनिश्रेष्ठ मूलाधारान्त्रवाङ्गलम् ॥
उसे ही मनुष्य-देह का मध्य भाग समझना चाहिए। वही मूलाधार है, पर हे मुनिश्रेष्ठ। इस स्थान से नौ अंगुल ऊर्ध्व में कन्द स्थान है।
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