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जाबाल दर्शन • अध्याय 4 • श्लोक 52
बहिस्तीर्थात्परं तीर्थमन्तस्तीर्थ महामुने। आत्मतीर्थ महातीर्थमन्यत्तीर्थं निरर्थकम् ॥
बाह्य जगत् के तीर्थ से अन्तः क्षेत्र के तीर्थ अति श्रेष्ठ हैं, ये महातीर्थ हैं, इन आन्तरिक तीर्थों के समक्ष अन्य सभी तीर्थ व्यर्थ हैं।
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