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जाबाल दर्शन • अध्याय 4 • श्लोक 1
शरीरं तावदेव स्यात्षण्णवत्यङ्गुलात्मकम्। देहमध्ये शिखिस्थानं तप्तजाम्बूनदप्रभम् ॥
हे सांकृते! यह मानव शरीर अपने हाथ की माप से ९६ अंगुल का होता है। इस शरीर के मध्य भाग में अग्नि का स्थान निहित है। उसका वर्ण तपाये हुए स्वर्ण के सदृश कहा गया है।
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