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अध्याय 1 — पहला अध्याय

वृत्रगीता
34 श्लोक • केवल अनुवाद
युधिष्ठिर ने कहा - पितामह! सभी लोग हम लोगों को धन्य-धन्य कहते हैं, परंतु हम लोगों से बढ़कर अत्यन्त दुःखी दूसरा कोई मनुष्य नहीं है।
कुरुश्रेष्ठ पितामह! देवताओं द्वारा मानव लोक में जन्म पाकर तथा सब लोगों द्वारा सम्मानित होकर भी हमें यहाँ महान् दुःख प्राप्त हुआ है।
कुरुश्रेष्ठ! संसारी मनुष्य जिसे दुःख कहते हैं, उस संन्यास का अवलम्बन हम लोग कब करेंगे? हमें तो इन शरीरों का धारण करना ही दुःख जान पड़ता है।
पितामह! पंच ज्ञानेन्द्रिय, पंच कर्मेन्द्रिय, पंच प्राण, मन और बुद्धि - ये सत्रह तत्त्व; काम, क्रोध, लोभ, भय और स्वप्न - ये संसार के पाँच हेतु; शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गन्ध - ये पाँच विषय; सत्त्व, रज और तम ये तीन गुण तथा पाँच भूतोंसहित अविद्या, अहंकार और कर्म - ये आठ तत्त्वों के समुदाय सब मिलाकर अड़तीस तत्त्व होते हैं।
इन सबसे मुक्त हुए तीक्ष्ण व्रतधारी मुनि पुनर्जन्म को नहीं प्राप्त होते हैं। परंतप पितामह! हम लोग भी कब अपना राज्य छोड़कर इसी स्थिति को प्राप्त होंगे?
भीष्मजी ने कहा - महाराज! दुःख अनन्त नहीं हैं। जगत्की सभी वस्तुएँ संख्या की सीमा में ही हैं - असंख्य नहीं हैं। पुनर्जन्म भी नश्वरता के लिये विख्यात ही है। तात्पर्य यह कि इस जगत्में कोई भी वस्तु अचल या स्थायी नहीं है।
तुम जो ऐसा मानते हो कि ऐश्वर्य दोषकारक होता है, क्योंकि वह आसक्ति का हेतु होने के कारण मोक्ष का प्रतिबन्धक है तो तुम्हारी यह मान्यता ठीक नहीं है; क्योंकि तुम सब लोग धर्म के ज्ञाता हो। स्वयं ही उद्योग करके शम, दम आदि साधनों द्वारा कुछ ही काल में मोक्ष प्राप्त कर सकते हो।
नरेश्वर! यह जीवात्मा पुण्य और पाप के फल सुख और दुःख भोगने में स्वतन्त्र नहीं है, उन पुण्य और पापों से उत्पन्न संस्काररूप अन्धकार से यह आच्छन्न हो जाता है।
जैसे अन्धकारमयी वायु मैनसिल के लाल-पीले चूर्ण में प्रवेश करके उसी के रंग से युक्त हो सम्पूर्ण दिशाओं को रंगती दिखायी देती है,
उसी प्रकार स्वभावतः वर्णविहीन यह जीवात्मा तमोमय अज्ञान से आवृत और कर्मफल से रंजित हो वही वर्ण ग्रहणकर अर्थात् विभिन्न शरीरों के धर्मों को स्वीकार करके समस्त प्राणियों के शरीरों में घूमता रहता है।
जब जीव तत्त्वज्ञान द्वारा अज्ञानजनित अन्धकार को दूर कर देता है, तब उसके हृदय में सनातन ब्रह्म प्रकाशित हो जाता है।
ऋषि-मुनि कहते हैं कि ब्रह्म की प्राप्ति किसी क्रियात्मक यत्न से साध्य नहीं है। इसके लिये तो देवताओं सहित सम्पूर्ण जगत्को और तुमको उन पुरुषों की उपासना करनी चाहिये, जो जीवन्मुक्त हैं; अतएव मैं महर्षियों के समुदाय को नमस्कार करता हूँ।
नरेश्वर! इस विषय में एक प्राचीन इतिहास कहा जाता है। उसे एकचित्त होकर सुनो। भरतनन्दन! पूर्वकाल में वृत्रासुर पराजित और ऐश्वर्य-भ्रष्ट हो गया था।
उसका कोई सहायक नहीं रह गया था। देवताओं ने उसका राज्य छीन लिया था। उस दशा में पड़कर भी उस असुर ने जैसी चेष्टा की थी, उसी का इस कथा में वर्णन है। वह शत्रुओं के बीच में रहकर भी आसक्तिशून्य बुद्धि का आश्रय ले शोक नहीं करता था।
पूर्वकाल की बात है कि वृत्रासुर को ऐश्वर्य-भ्रष्ट हुआ देख शुक्राचार्य ने उससे पूछा - 'दानवराज! तुम्हें देवताओं ने पराजित कर दिया है तो भी आजकल तुम्हारे चित्त में किसी प्रकार की व्यथा नहीं है; इसका क्या कारण है?'
वृत्रासुर ने कहा - ब्रह्मन्! मैंने सत्य और तप के प्रभाव से जीवों के आवागमन का रहस्य निश्चितरूप से जान लिया है; इसलिये मैं उसके विषय में हर्ष और शोक नहीं करता हूँ।
काल से प्रेरित हुए जीव अपने पापकर्मों के फलस्वरूप विवश होकर 'नरक में डूबते हैं और पुण्य के फल से वे सब-के-सब स्वर्गलोक में जाकर वहाँ आनन्द भोगते हैं।' ऐसा मनीषी पुरुषों का कथन है।
इस प्रकार स्वर्ग अथवा नरक में कर्मफलभोग द्वारा निश्चित समय व्यतीत करके भोगने से बचे हुए कर्मसहित काल की प्रेरणा से वे बारम्बार इस संसार में जन्म लेते रहते हैं।
कामनाओं के बन्धन में बँधकर विवश हुए कितने ही जीव सहस्रों बार तिर्यक्योनि तथा नरक में पड़कर पुनः वहाँ से निकलते हैं।
इस प्रकार मैंने सभी जीवों को जन्म-मरण के चक्कर में पड़ा हुआ देखा है। शास्त्र का भी ऐसा सिद्धान्त है कि जैसा कर्म होता है, वैसा ही फल मिलता है।
प्राणी पहले ही सुख-दुःख तथा प्रिय और अप्रिय विषयों में विचरण करके कर्म के अनुसार नरक, तिर्यग्योनि, मनुष्ययोनि अथवा देवयोनि में जाते हैं।
समस्त जीव-जगत् विधाता के विधान से ही परिचालित हो सुख-दुःख पाता है और समस्त प्राणी सदा चले हुए मार्ग पर ही चलते हैं।
जो काल नाम से प्रसिद्ध एवं सृष्टि और पालन के परम आश्रय हैं, उन परमात्मा का प्रतिपादन करते हुए वृत्रासुर की बात सुनकर भगवान् शुक्राचार्य ने उससे कहा - 'तात! तुम तो बड़े बुद्धिमान् हो, फिर ये असुरभाव के विपरीत दोषयुक्त निरर्थक वचन कैसे कह रहे हो?
वृत्रासुर ने कहा - ब्रह्मन्! आपने तथा दूसरे मनीषी महानुभावों ने यह तो प्रत्यक्ष देखा है कि मैंने पहले विजय के लोभ से बड़ी भारी तपस्या की थी।
मैं बल में बहुत बढ़ा-चढ़ा था; अतः मैंने अपने ही तेज से तीनों लोकों पर आक्रमण करके दूसरे प्राणियों को धूल में मिलाकर उनके उपभोग की गन्ध और रस आदि विविध वस्तुएँ छीन ली थी।
मेरे शरीर से आग की लपटें निकलती थीं और मैं ज्वालामालाओं से घिरकर सदा आकाश में निर्भय विचरता हुआ समस्त प्राणियों के लिये अजेय हो गया था।
भगवन्! इस प्रकार मैंने तपस्या के प्रभाव से जो ऐश्वर्य प्राप्त किया था, वह मेरे अपने ही कर्मों से नष्ट हो गया। तथापि मैं धैर्य धारण करके उसके लिये शोक नहीं करता हूँ।
महामनस्वी पुरुषप्रवर देवराज इन्द्र जब युद्ध की इच्छा से मेरे सामने आये, उस समय उनके साथ उन्हीं की सहायता के लिये आये हुए सबके प्रभु भगवान् श्रीनारायण हरि का मैंने दर्शन किया था।
वे भगवान् वैकुण्ठ, पुरुष, अनन्त, शुक्ल, विष्णु, सनातन, मुंजकेश, हरिश्मश्रु तथा सम्पूर्ण भूतों के पितामह हैं।
भगवन्! अवश्य ही मेरी उस तपस्या का कोई अंश अब भी शेष रह गया है, अतः मैं उस कर्मफल के विषय में प्रश्न करना चाहता हूँ।
अणिमा आदि ऐश्वर्य और महद् ब्रह्म किस वर्ण में प्रतिष्ठित हैं? तथा वह उत्तम ऐश्वर्य कैसे नष्ट हो जाता है?
प्राणी किस हेतु से जीवन धारण करते हैं? तथा किस कारण से कर्मों में प्रवृत्त होते हैं? जीव किस परम फल को पाकर अविनाशी एवं सनातनरूप से प्रतिष्ठित होता है?
विप्रवर! किस कर्म अथवा ज्ञान से उस फल को प्राप्त किया जा सकता है? यह मुझे बताने की कृपा करें।
राजसिंह! पुरुषप्रवर युधिष्ठिर! उसके ऐसा प्रश्न करने पर मुनिवर शुक्राचार्य ने उस समय उसे जो उत्तर दिया, उसे मैं बता रहा हूँ, तुम अपने भाइयों के साथ एकाग्रचित्त होकर सुनो।
Krishjan
धर्म का अन्वेषण
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