अध्याय 1 — पहला अध्याय
वृत्रगीता
34 श्लोक • केवल अनुवाद
पितामह! पंच ज्ञानेन्द्रिय, पंच कर्मेन्द्रिय, पंच प्राण, मन और बुद्धि - ये सत्रह तत्त्व; काम, क्रोध, लोभ, भय और स्वप्न - ये संसार के पाँच हेतु; शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गन्ध - ये पाँच विषय; सत्त्व, रज और तम ये तीन गुण तथा पाँच भूतोंसहित अविद्या, अहंकार और कर्म - ये आठ तत्त्वों के समुदाय सब मिलाकर अड़तीस तत्त्व होते हैं।