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वृत्रगीता • अध्याय 1 • श्लोक 10
तथा कर्मफलैर्देही रञ्जितस्तमसावृतः । विवर्णो वर्णमाश्रित्य देहेषु परिवर्तते ॥
उसी प्रकार स्वभावतः वर्णविहीन यह जीवात्मा तमोमय अज्ञान से आवृत और कर्मफल से रंजित हो वही वर्ण ग्रहणकर अर्थात् विभिन्न शरीरों के धर्मों को स्वीकार करके समस्त प्राणियों के शरीरों में घूमता रहता है।
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