भ्रष्टैश्वर्यं पुरा वृत्रमुशना वाक्यमब्रवीत् ।
काचित् पराजितस्याद्य न व्यथा तेऽस्ति दानव ॥
पूर्वकाल की बात है कि वृत्रासुर को ऐश्वर्य-भ्रष्ट हुआ देख शुक्राचार्य ने उससे पूछा - 'दानवराज! तुम्हें देवताओं ने पराजित कर दिया है तो भी आजकल तुम्हारे चित्त में किसी प्रकार की व्यथा नहीं है; इसका क्या कारण है?'
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