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वृत्रगीता • अध्याय 1 • श्लोक 3
कदा वयं करिष्यामः संन्यासं दुःखसंज्ञकम् । दुःखमेतच्छरीराणां धारणं कुरुसत्तम ॥
कुरुश्रेष्ठ! संसारी मनुष्य जिसे दुःख कहते हैं, उस संन्यास का अवलम्बन हम लोग कब करेंगे? हमें तो इन शरीरों का धारण करना ही दुःख जान पड़ता है।
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