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वृत्रगीता • अध्याय 1 • श्लोक 2
लोकसम्भावितैर्दुःखं यत् प्राप्तं कुरुसत्तम । प्राप्य जातिं मनुष्येषु देवैरपि पितामह ॥
कुरुश्रेष्ठ पितामह! देवताओं द्वारा मानव लोक में जन्म पाकर तथा सब लोगों द्वारा सम्मानित होकर भी हमें यहाँ महान् दुःख प्राप्त हुआ है।
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