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वृत्रगीता • अध्याय 1 • श्लोक 14
निर्जितेनासहायेन हृतराज्येन भारत । अशोचता शत्रुमध्ये बुद्धिमास्थाय केवलाम् ॥
उसका कोई सहायक नहीं रह गया था। देवताओं ने उसका राज्य छीन लिया था। उस दशा में पड़कर भी उस असुर ने जैसी चेष्टा की थी, उसी का इस कथा में वर्णन है। वह शत्रुओं के बीच में रहकर भी आसक्तिशून्य बुद्धि का आश्रय ले शोक नहीं करता था।
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