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वृत्रगीता • अध्याय 1 • श्लोक 4
विमुक्ताः सप्तदशभिर्हेतुभूतैश्च पञ्चभिः । इन्द्रियार्थैर्गुणैश्चैव अष्टाभिश्च पितामह ॥
पितामह! पंच ज्ञानेन्द्रिय, पंच कर्मेन्द्रिय, पंच प्राण, मन और बुद्धि - ये सत्रह तत्त्व; काम, क्रोध, लोभ, भय और स्वप्न - ये संसार के पाँच हेतु; शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गन्ध - ये पाँच विषय; सत्त्व, रज और तम ये तीन गुण तथा पाँच भूतोंसहित अविद्या, अहंकार और कर्म - ये आठ तत्त्वों के समुदाय सब मिलाकर अड़तीस तत्त्व होते हैं।
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