हे नृपते! यह देही(जीव) सदा पुण्य और पाप पर पूर्ण अधिकार नहीं रखता। इसी कारण उत्पन्न होने वाले संस्काररूप अन्धकार(अज्ञानरूप तमस) से वह आच्छादित भी हो जाता है।
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