नरेश्वर! यह जीवात्मा पुण्य और पाप के फल सुख और दुःख भोगने में स्वतन्त्र नहीं है, उन पुण्य और पापों से उत्पन्न संस्काररूप अन्धकार से यह आच्छन्न हो जाता है।
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