सत्येन तपसा चैव विदित्वासंशयं ह्यहम्।
न शोचामि न हृष्यामि भूतानामागतिं गतिम् ॥
वृत्रासुर ने कहा—
ब्रह्मन्! मैंने सत्य और तप(आत्मिक अनुशासन एवं साधना) के द्वारा मैंने निःसंदेह प्राणियों की उत्पत्ति और उनकी गति(आवागमन तथा जीवन-मरण का चक्र) को जान लिया है।
इसलिए मैं न तो शोक करता हूँ और न ही हर्ष से उद्वेलित होता हूँ।
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