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वृत्रगीता • अध्याय 1 • श्लोक 27
ऐश्वर्यं तपसा प्राप्तं भ्रष्टं तच्च स्वकर्मभिः । धृतिमास्थाय भगवन् न शोचामि ततस्त्वहम् ॥
हे भगवन्! मैंने तप के द्वारा जो ऐश्वर्य प्राप्त किया था, वह मेरे ही कर्मों के कारण नष्ट हो गया। अतः धैर्य का आश्रय लेकर मैं उस ऐश्वर्य के नष्ट हो जाने पर शोक नहीं करता।
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