मुख्य पृष्ठ शास्त्र परिचय ऐप इंस्टॉल करें
वृत्रगीता • अध्याय 1 • श्लोक 27
ऐश्वर्यं तपसा प्राप्तं भ्रष्टं तच्च स्वकर्मभिः । धृतिमास्थाय भगवन् न शोचामि ततस्त्वहम् ॥
भगवन्! इस प्रकार मैंने तपस्या के प्रभाव से जो ऐश्वर्य प्राप्त किया था, वह मेरे अपने ही कर्मों से नष्ट हो गया। तथापि मैं धैर्य धारण करके उसके लिये शोक नहीं करता हूँ।
पूरा ग्रंथ पढ़ें
वृत्रगीता के सभी अध्याय और श्लोकों को उनके अर्थ और व्याख्या सहित पढ़ने के लिए Krishjan ऐप इंस्टॉल करें। ऐप में आपको संरचित अध्याय, आसान नेविगेशन और ऑफलाइन पढ़ने की सुविधा मिलती है।

सभी अध्याय उपलब्ध

वृत्रगीता के 18 अध्याय और सभी श्लोक एक ही स्थान पर।

सरल अर्थ

प्रत्येक श्लोक के साथ स्पष्ट हिंदी अनुवाद।

ऑफलाइन पढ़ें

इंटरनेट के बिना भी ग्रंथ पढ़ें।
Krishjan
धर्म का अन्वेषण
ऐप इंस्टॉल करें