मुख्य पृष्ठ शास्त्र परिचय ऐप इंस्टॉल करें
वृत्रगीता • अध्याय 1 • श्लोक 21
तिर्यग् गच्छन्ति नरकं मानुष्यं दैवमेव च। सुखदुःखे प्रिये द्वेष्ये चरित्वा पूर्वमेव ह॥
जीव अपने पूर्वकृत कर्मों के अनुसार तिर्यक् योनि (पशु-पक्षी आदि), नरक, मनुष्य योनि तथा देवयोनि को प्राप्त होते हैं। वे पूर्वजन्मों में अर्जित सुख-दुःख, प्रिय-अप्रिय अनुभवों का भोग करते हुए इन विभिन्न अवस्थाओं में विचरण करते रहते हैं।
पूरा ग्रंथ पढ़ें
वृत्रगीता के सभी अध्याय और श्लोकों को उनके अर्थ और व्याख्या सहित पढ़ने के लिए Krishjan ऐप इंस्टॉल करें। ऐप में आपको संरचित अध्याय, आसान नेविगेशन और ऑफलाइन पढ़ने की सुविधा मिलती है।

सभी अध्याय उपलब्ध

वृत्रगीता के 18 अध्याय और सभी श्लोक एक ही स्थान पर।

सरल अर्थ

प्रत्येक श्लोक के साथ स्पष्ट हिंदी अनुवाद।

ऑफलाइन पढ़ें

इंटरनेट के बिना भी ग्रंथ पढ़ें।
Krishjan
धर्म का अन्वेषण
ऐप इंस्टॉल करें