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वृत्रगीता • अध्याय 1 • श्लोक 26
ज्वालामालापरिक्षिप्तो वैहायसचरस्तथा । अजेयः सर्वभूतानामासं नित्यमपेतभीः ॥
मेरे शरीर से आग की लपटें निकलती थीं और मैं ज्वालामालाओं से घिरकर सदा आकाश में निर्भय विचरता हुआ समस्त प्राणियों के लिये अजेय हो गया था।
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