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वृत्रगीता • अध्याय 1 • श्लोक 19
तिर्यग्योनिसहस्त्राणि गत्वा नरकमेव च। निर्गच्छन्त्यवशा जीवाः कामबन्धनबन्धनाः ॥
कामनाओं के बन्धन में बँधकर विवश हुए कितने ही जीव सहस्रों बार तिर्यक्योनि तथा नरक में पड़कर पुनः वहाँ से निकलते हैं।
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