कामनाओं के बन्धन में बँधे हुए जीव, विवश होकर हजारों तिर्यक् योनियों(पशु-पक्षी आदि की योनियों) में जन्म लेते हैं और नरक को भी प्राप्त होते हैं।
तत्पश्चात् वे उसी बन्धन के वशीभूत होकर वहाँ से निकलकर पुनः संसार-चक्र में प्रविष्ट होते रहते हैं।
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