मुख्य पृष्ठ शास्त्र परिचय ऐप इंस्टॉल करें
वृत्रगीता • अध्याय 1 • श्लोक 34
इतीदमुक्तः स मुनिस्तदानीं प्रत्याह यत् तच्छृणु राजसिंह। मयोच्यमानं पुरुषर्षभत्व-मनन्यचित्तः सह सोदरीयैः ॥ ॥ इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि मोक्षधर्मपर्वणि वृत्रगीतासु प्रथमोऽध्यायः ॥
इस प्रकार कहे जाने पर उस समय उस मुनि ने उत्तर दिया — "हे राजसिंह! अब जो मैं कहने जा रहा हूँ, उसे तुम अपने भाइयों सहित एकाग्रचित्त होकर सुनो।" ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत के शान्तिपर्व के मोक्षधर्मपर्व में स्थित वृत्रगीता का प्रथम अध्याय समाप्त हुआ।
पूरा ग्रंथ पढ़ें
वृत्रगीता के सभी अध्याय और श्लोकों को उनके अर्थ और व्याख्या सहित पढ़ने के लिए Krishjan ऐप इंस्टॉल करें। ऐप में आपको संरचित अध्याय, आसान नेविगेशन और ऑफलाइन पढ़ने की सुविधा मिलती है।

सभी अध्याय उपलब्ध

वृत्रगीता के 18 अध्याय और सभी श्लोक एक ही स्थान पर।

सरल अर्थ

प्रत्येक श्लोक के साथ स्पष्ट हिंदी अनुवाद।

ऑफलाइन पढ़ें

इंटरनेट के बिना भी ग्रंथ पढ़ें।
Krishjan
धर्म का अन्वेषण
ऐप इंस्टॉल करें