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वृत्रगीता • अध्याय 1 • श्लोक 23
कालसंख्यानसंख्यातं सृष्टिस्थितिपरायणम् । तं भाषमाणं भगवानुशना प्रत्यभाषत । धीमान् दुष्टप्रलापांस्त्वं तात कस्मात् प्रभाषसे ॥
जो काल नाम से प्रसिद्ध एवं सृष्टि और पालन के परम आश्रय हैं, उन परमात्मा का प्रतिपादन करते हुए वृत्रासुर की बात सुनकर भगवान् शुक्राचार्य ने उससे कहा - 'तात! तुम तो बड़े बुद्धिमान् हो, फिर ये असुरभाव के विपरीत दोषयुक्त निरर्थक वचन कैसे कह रहे हो?
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