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वृत्रगीता • अध्याय 1 • श्लोक 9
यथाञ्जनमयो वायुः पुनर्मानःशिलं रजः । अनुप्रविश्य तद्वर्णो दृश्यते रञ्जयन् दिशः ॥
जैसे अन्धकारमयी वायु मैनसिल के लाल-पीले चूर्ण में प्रवेश करके उसी के रंग से युक्त हो सम्पूर्ण दिशाओं को रंगती दिखायी देती है,
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