मुख्य पृष्ठ शास्त्र परिचय ऐप इंस्टॉल करें
वृत्रगीता • अध्याय 1 • श्लोक 25
गन्धानादाय भूतानां रसांश्च विविधानपि। अवधं त्रीन् समाक्रम्य लोकान् वै स्वेन तेजसा ॥
मैं बल में बहुत बढ़ा-चढ़ा था; अतः मैंने अपने ही तेज से तीनों लोकों पर आक्रमण करके दूसरे प्राणियों को धूल में मिलाकर उनके उपभोग की गन्ध और रस आदि विविध वस्तुएँ छीन ली थी।
पूरा ग्रंथ पढ़ें
वृत्रगीता के सभी अध्याय और श्लोकों को उनके अर्थ और व्याख्या सहित पढ़ने के लिए Krishjan ऐप इंस्टॉल करें। ऐप में आपको संरचित अध्याय, आसान नेविगेशन और ऑफलाइन पढ़ने की सुविधा मिलती है।

सभी अध्याय उपलब्ध

वृत्रगीता के 18 अध्याय और सभी श्लोक एक ही स्थान पर।

सरल अर्थ

प्रत्येक श्लोक के साथ स्पष्ट हिंदी अनुवाद।

ऑफलाइन पढ़ें

इंटरनेट के बिना भी ग्रंथ पढ़ें।
Krishjan
धर्म का अन्वेषण
ऐप इंस्टॉल करें