Krishjan
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अध्याय 1 — शुकरहस्योपनिषद्
शुकरहस्य
52 श्लोक • केवल अनुवाद
अब
रहस्योपनिषद्
का वर्णन किया जाता है।
एक बार
देवर्षियों
ने
देव ब्रह्माजी
की पूजा की और हाथ जोड़कर नमस्कार करते हुए उनसे निवेदन किया— "भगवन्! आप हमारे लिए
रहस्योपनिषद्
का उपदेश करें।"
इस पर
ब्रह्माजी
ने कहा— प्राचीनकाल में
महातेजस्वी
,
तपोनिष्ठ
तथा सम्पूर्ण
वेदों
के विग्रहस्वरूप
श्री वेदव्यासजी
ने
पार्वती
सहित
भगवान् शिव
को हाथ जोड़कर प्रणाम किया और उनसे प्रार्थना की।
श्री वेदव्यास
ने कहा— हे
देवों के देव महादेव
! हे
महाप्राज्ञ
! हे
जगत्-पाशों
के उच्छेदक! हे
सुदृढ़ व्रतधारी
! मेरे पुत्र
शुकदेव
के
वेदाध्ययन-संस्कार
में
प्रणव
और
गायत्री-मन्त्र
के उपदेश का समय आ गया है। हे
जगद्गुरु
! आप उसके लिए
मन्त्रोपदेश
का कर्तव्य स्वीकार करें।
अब
ब्रह्मोपदेश
का समय उपस्थित हो गया है। हे
जगद्गुरु
! आज आपको
ब्रह्मोपदेश
करना चाहिए।
भगवान् शिव
ने कहा— हे
महामुने
! यदि मैं तुम्हारे पुत्र को
शुद्धस्वरूप
साक्षात्
सनातन परब्रह्म
का उपदेश करूँगा, तो वह सब कुछ त्यागकर,
वैराग्यवान्
होकर स्वयं ही
प्रकाशस्वरूप
को प्राप्त हो जाएगा।
श्री वेदव्यासजी
ने निवेदन किया— चाहे जैसा भी हो, आप मेरे पुत्र के
उपनयन-संस्कार
में अनुग्रहपूर्वक उसे
ब्रह्मज्ञान
का उपदेश करें।
हे
महेश्वर
! मेरा पुत्र शीघ्र ही
सर्वज्ञानी
हो और आपके अनुग्रह का पात्र बनकर
चतुर्विध मुक्ति
(सायुज्य, सामीप्य, सारूप्य एवं सालोक्य)
को प्राप्त हो जाए।
श्री वेदव्यासजी
की प्रार्थना स्वीकार करके
भगवान् शिव
,
भगवती उमा
सहित
देवर्षियों
की सभा में उपदेश देने के लिए गए और प्रसन्नतापूर्वक एक दिव्य आसन पर अधिष्ठित हुए।
वहाँ
शुकदेव मुनि
,
भगवान् शिव
से भक्तिपूर्ण भाव से
सत्संग
का लाभ प्राप्त कर कृतकृत्य हुए।
प्रणव-दीक्षा
ग्रहण करने के पश्चात् वे पुनः
भगवान्
से प्रार्थना करने लगे।
मुनि शुकदेवजी
ने निवेदन किया— हे
देवों के आदि देव
! हे
सर्वज्ञ
! हे
सच्चिदानन्दस्वरूप
! हे
उमापति
! आप सम्पूर्ण
प्राणियों
पर कृपा करने वाले
करुणा के भण्डार
हैं। आप मुझ पर प्रसन्न हों।
आपने मेरे लिए
प्रणवस्वरूप
तथा उससे परे
परब्रह्म
का उपदेश किया है; परन्तु मैं विशेष रूप से
महावाक्यों
, जैसे—
‘तत्त्वमसि’
और
‘प्रज्ञानं ब्रह्म’
आदि के तत्त्व को
षडङ्गन्यास-क्रम
के अनुसार सुनने की इच्छा रखता हूँ। हे
सदाशिव
! कृपापूर्वक मेरे लिए उन
रहस्यों
को प्रकट करें।
भगवान् शिव
ने कहा— हे
ज्ञाननिधि
मुनि शुकदेव
! तुम निश्चय ही
महान् प्रज्ञावान्
हो। तुमने
वेदों
के
गूढ़ रहस्यों
के व्यावहारिक स्वरूप के विषय में प्रश्न किया है।
अतः मैं तुम्हारे लिए इस
रहस्योपनिषद्
नामक
गूढ़ विषय
का
षडङ्गन्यास
के अनुसार वर्णन करता हूँ। इसका
(अनुभूतिजन्य)
विशेष
ज्ञान
प्राप्त हो जाने पर साक्षात्
मोक्ष
की प्राप्ति में कोई संशय नहीं रहता।
उचित यही है कि
गुरु
के द्वारा
अङ्गहीन वाक्यों
का उपदेश नहीं किया जाना चाहिए; अपितु सभी
महावाक्यों
का
षडङ्ग
सहित उपदेश करना चाहिए।
जिस प्रकार चारों
वेदों
में
उपनिषद्
सर्वश्रेष्ठ हैं, उसी प्रकार सम्पूर्ण
उपनिषदों
में
रहस्योपनिषद्
सर्वश्रेष्ठ है।
जिस
तत्त्वदर्शी विचारक
ने इस
रहस्योपनिषद्
में वर्णित
ब्रह्म
का चिन्तन-मनन कर लिया है, उसके लिए
तीर्थ-सेवन
,
मन्त्र-पाठ
,
वेद-पाठ
तथा
जप
आदि जैसे पुण्यदायक साधनों का क्या प्रयोजन रह जाता है?
महावाक्यों
के अर्थों पर सौ
शरद् ऋतुओं
(वर्षों)
तक विचार करने से जिस फल की प्राप्ति होती है, वही फल इन वाक्यों का
ऋष्यादि
के स्मरण सहित एक बार जप करने से ही प्राप्त हो जाता है।
ॐ
इस
महावाक्य-महामन्त्र
के
हंस ऋषि
हैं,
अव्यक्त गायत्री
इसका छन्द है,
परमहंस
इसके देवता हैं,
हं
इसका बीजमन्त्र है,
सः
इसकी शक्ति है और
सोऽहं
इसका कीलक है।
परमहंस देवता
की प्रीति के लिए इस
महावाक्य
का विनियोग किया जाता है।
करन्यास के लिए—
ब्रह्म
(जो सत्य, ज्ञानमय और अनन्त है)
उसे नमस्कार है—
अँगूठे
का स्पर्श।
ब्रह्म
(जो नित्य एवं शाश्वत आनन्दस्वरूप है)
उसे नमस्कार है—
तर्जनी अँगुली
का स्पर्श।
ब्रह्म
(जो नित्यानन्दमय है)
उसे नमस्कार है—
मध्यमा अँगुली
का स्पर्श। जो
अतिविस्तृत
है
(वह ब्रह्म है)
, उसे नमस्कार है—
अनामिका अँगुली
का स्पर्श। जो
अतिविस्तृत
का भी अधिपति है
(वह ब्रह्म है)
, उसे नमस्कार है—
कनिष्ठिका अँगुली
का स्पर्श।
ब्रह्म
एक और
अद्वितीय
है, उसे नमस्कार है—
करतल
एवं
कर-पृष्ठ
का स्पर्श।
ब्रह्म
(जो सत्य, ज्ञानमय एवं अनन्त है)
उसे नमस्कार है—
हृदय
(स्थान)
का स्पर्श।
ब्रह्म
(जो नित्य आनन्दस्वरूप है)
उसे नमस्कार है—
सिर
का स्पर्श।
ब्रह्म
(जो नित्यानन्दमय है)
उसे नमस्कार है—
शिखा
का स्पर्श। जो
विस्तृत
है
(वह ब्रह्म है)
, उसे नमस्कार है—
दाएँ-बाएँ कन्धों
का स्पर्श। जो
विस्तृत
का अधिपति है
(वह ब्रह्म है)
, उसे नमस्कार है—
दोनों नेत्रों
का स्पर्श।
ब्रह्म
एक और
अद्वितीय
है, उसे नमस्कार है— दाएँ हाथ को सिर के ऊपर से घुमाकर बाएँ हाथ पर ताली बजाएँ।
ॐ
(परब्रह्म)
भूः
(भूलोक)
,
भुवः
(अन्तरिक्ष)
और
स्वः
(द्युलोक)
में संव्याप्त है, उसे नमस्कार है— सभी दिशाओं से रक्षा का विधान।
ध्यान
— जो सदा
आनन्दस्वरूप
, परम
सुखदायी
तथा
ज्ञान
के साक्षात् विग्रह हैं; जो
संसार
के
द्वन्द्वों
(सुख-दुःख आदि)
से रहित, व्यापक
आकाश
के समान
(निर्लिप्त)
हैं तथा जो सदैव एकमात्र
परमात्मतत्त्व
को ही लक्ष्य करते हैं; जो
एक
,
नित्य
और सदैव
शुद्धस्वरूप
हैं; जो
(झंझावातों में भी)
अचल रहते हैं; जो सभी की
बुद्धि
में अधिष्ठित, समस्त
प्राणियों
के
साक्षिरूप
, तथा
राग
,
आसक्ति
,
लोभ
,
मोह
और
अहंकार
जैसे
त्रिगुणजन्य भावों
से रहित हैं— उन
सद्गुरु
को हम नमस्कार करते हैं।
अब
चार महावाक्य
दिए जाते हैं—
ॐ प्रज्ञानं ब्रह्म
(प्रकृष्ट ज्ञान ही ब्रह्म है)
।
ॐ अहं ब्रह्मास्मि
(मैं ब्रह्म हूँ)
।
ॐ तत्त्वमसि
(वह ब्रह्म तुम ही हो)
।
ॐ अयमात्मा ब्रह्म
(यह आत्मा ही ब्रह्म है)
। इनमें से
‘तत्त्वमसि’
महावाक्य
ब्रह्म
के साथ
अभेद
का प्रतिपादन करता है। जो साधक इसका
जप
(चिन्तन-मनन)
करते हैं, वे
भगवान् शिव
से
सायुज्य-मुक्ति
का फल प्राप्त करते हैं।
तत्पुरुष
को नमस्कार है—
अँगूठे
का स्पर्श।
ईशान
को नमस्कार है—
तर्जनी
का स्पर्श।
अघोर
को नमस्कार है—
मध्यमा अँगुली
का स्पर्श।
सद्योजात
को नमस्कार है—
अनामिका
का स्पर्श।
वामदेव
को नमस्कार है—
कनिष्ठिका
का स्पर्श।
तत्पुरुष
,
ईशान
,
अघोर
,
सद्योजात
और
वामदेव
को नमस्कार है—
करतल
एवं
कर-पृष्ठ
का स्पर्श। इसी प्रकार
हृदयादि-न्यास
का क्रम है।
ॐ
(परमात्मा)
भूः
(भूलोक)
,
भुवः
(अन्तरिक्ष लोक)
तथा
स्वः
(द्युलोक)
में संव्याप्त है— उसे नमस्कार है; यह सभी दिशाओं से रक्षा का विधान है।
वह
ज्ञानरूप
है,
ज्ञेय
(जानने योग्य)
है तथा
ज्ञानगम्यता
से भी परे है। वह
विशुद्धस्वरूप
,
बुद्धिस्वरूप
,
मुक्तस्वरूप
और
अविनाशी
है। वही
सत्य
,
ज्ञान
और
सच्चिदानन्दस्वरूप
है तथा ध्यान करने योग्य है। हमें उस
महातेजस्वी देव
का ध्यान करना चाहिए।
यहाँ
महामन्त्र
के
त्वम्-पद
के
ऋषि
—
विष्णु
हैं। इसका
छन्द
—
गायत्री
है।
देवता
—
परमात्मा
हैं।
बीज
—
‘ऐं’
है।
शक्ति
—
‘क्लीं’
है।
कीलक
—
‘सौः’
है। मेरी
मुक्ति
के लिए इस
जप
का विनियोग है।
करन्यास—
वासुदेव
को नमस्कार है—
अँगूठे
का स्पर्श।
संकर्षण
को नमस्कार है—
तर्जनी
का स्पर्श।
प्रद्युम्न
को नमस्कार है—
मध्यमा
का स्पर्श।
अनिरुद्ध
को नमस्कार है—
अनामिका
का स्पर्श।
वासुदेव
को नमस्कार है—
कनिष्ठिका
का स्पर्श।
वासुदेव
,
संकर्षण
,
प्रद्युम्न
तथा
अनिरुद्ध
को नमस्कार है—
करतल
एवं
कर-पृष्ठ
का स्पर्श। इसी प्रकार
हृदयादिन्यास
(अङ्गन्यास)
का क्रम है।
‘भूर्भुवः स्वः ॐ’
— यह
दिग्बन्ध
है।
आप सभी
प्राणियों
में
जीवस्वरूप
हैं, सर्वत्र
अखण्ड विग्रह
के रूप में स्थित हैं तथा हमारे
चित्त
और
अहंकार
को नियंत्रित करने वाले हैं। हम
जीवस्वरूप
त्वम्-पद
(‘तत्त्वमसि’ महावाक्य के अन्तर्गत)
की स्तुति करते हैं।
महामन्त्र
के
‘असि’ पद
के
ऋषि
—
मन
हैं। इसका
छन्द
—
गायत्री
है।
देवता
—
अर्धनारीश्वर
हैं।
बीज
—
अव्यक्तादि
है।
शक्ति
—
नृसिंह
हैं।
कीलक
—
परमात्मा
हैं।
जीव
और
ब्रह्म
के
ऐक्य
के लिए इस
जप
का निम्न विनियोग है।
करन्यास—
पृथ्वी-द्वयणुक
को नमस्कार है—
अँगूठे
का स्पर्श।
अप्
(जल)
द्वयणुक
को नमस्कार है—
तर्जनी
का स्पर्श।
तेज
(अग्नि)
द्वयणुक
को नमस्कार है—
मध्यमा
का स्पर्श।
वायु-द्वयणुक
को नमस्कार है—
अनामिका
का स्पर्श।
आकाश-द्वयणुक
को नमस्कार है—
कनिष्ठिका
का स्पर्श।
पृथ्वी
,
अप्
,
तेज
,
वायु
तथा
आकाश
के
द्वयणुकों
को नमस्कार है—
करतल
एवं
कर-पृष्ठ
का स्पर्श। इसी प्रकार
हृदयादि-न्यास
का क्रम है।
‘भूर्भुवः स्वः ॐ’
— यह
दिग्बन्ध
है।
‘जीव ही ब्रह्म है’
— इस
महावाक्य
के अर्थ पर जो साधक विचार करता है,
मन
को स्थिर करता है तथा
‘असि’
पद का निरन्तर
चिन्तन-मनन
करता है, वह
तत्त्वों
के
ऐक्य
का साक्षात्कार करने में समर्थ हो जाता है
(अर्थात् पंचतत्त्व अन्ततः एकमात्र ब्रह्म में विलीन हो जाते हैं।)
इस प्रकार
महावाक्यों
के
षडङ्गों
का विवेचन किया गया।
अब
रहस्योपनिषद्
के वाक्यार्थ का प्रतिपादन करने वाले
श्लोकों
का उपदेश किया जाता है।
जिसके द्वारा
प्राणी
देखता है, सुनता है, सूँघता है, बोलता है तथा
स्वाद
और
अस्वाद
का अनुभव करता है, वही
प्रज्ञान
कहलाता है।
चतुर्मुख ब्रह्मा
,
इन्द्रदेव
, समस्त
देवताओं
,
मनुष्यों
,
अश्वों
,
गौओं
तथा अन्य सभी
प्राणियों
में एक ही
चैतन्य सत्ता
—
ब्रह्म
अवस्थित है। वही
प्रज्ञान-ब्रह्म
मुझमें भी विद्यमान है।
यह
मानव शरीर
ही
परिपूर्ण ब्रह्मविद्या
की प्राप्ति का अधिकारी है। इस शरीर में
साक्षिरूप
से अवस्थित
परमात्म-बुद्धि
के स्फुरित होने पर उसे
‘अहं’
कहा जाता है।
स्वतः सिद्ध एवं
परिपूर्ण परमात्मा
का यहाँ
‘ब्रह्म’
शब्द द्वारा निरूपण किया गया है।
‘अस्मि’
शब्द से
ब्रह्म
और
जीव
की
एकता
का बोध होता है। इस प्रकार
‘अहं ब्रह्मास्मि’
का अर्थ है—
मैं ही ब्रह्म हूँ
(यही इसका तात्पर्य है)
।
सृष्टि
की उत्पत्ति से पूर्व,
द्वैत
के अस्तित्व से रहित,
नाम
और
रूप
से परे, एकमात्र
सत्यस्वरूप
,
अद्वितीय ब्रह्म
ही विद्यमान था और वही
ब्रह्म
आज भी विद्यमान है। वही
ब्रह्म
‘तत्’ पद
(‘तत्त्वमसि’ महावाक्य में)
द्वारा निरूपित किया गया है।
उपदेशों का श्रवण करने वाले
शिष्य
के उस
आत्मतत्त्व
को, जो
शरीर
और
इन्द्रियों
से परे है,
‘त्वम्’
पद द्वारा निरूपित किया गया है।
‘असि’
पद के द्वारा
‘तत्’
और
‘त्वम्’
पदों के वाच्यार्थ—
ब्रह्म
और
आत्मतत्त्व
के
ऐक्य
का अनुभव करना चाहिए।
उस
(‘अयमात्मा ब्रह्म’ महावाक्य के अन्तर्गत)
स्वप्रकाशित
,
परोक्ष
(प्रत्यक्ष शरीर से परे)
तत्त्व
का प्रतिपादन
‘अयं’
पद द्वारा किया गया है।
अहंकार
से लेकर
शरीर
तक को
प्रत्यक् आत्मा
कहा गया है।
इस सम्पूर्ण
दृश्यमान जगत्
में जो
तत्त्व
संव्याप्त है, उसका निरूपण
‘ब्रह्म’
शब्द द्वारा किया जाता है। वही
ब्रह्म
स्वयं-प्रकाशित
आत्मतत्त्व
के रूप में
(समस्त प्राणियों में)
संव्याप्त है।
मैं
अनात्म पदार्थों
में
आत्मतुष्टि
के कारण
अविवेक
की निद्रा में,
‘मैं’
और
‘मेरे’
की सम्मोहित अवस्था में, स्वप्न के समान विचरण कर रहा था।
गुरु
द्वारा प्रदत्त
महावाक्य-पदों
के उपदेश से,
आत्मस्वरूप सूर्य
के उदय होने पर मैं प्रबुद्ध हो गया हूँ
(ऐसा मुनि शुकदेव अनुभव करते हैं।)
।
महावाक्यों
के अर्थ को समझने के लिए उनके
वाच्य
और
लक्ष्य
— दोनों अर्थों का अनुसरण करना चाहिए। वाच्यार्थ के अनुसार
भौतिक इन्द्रियाँ
आदि भी
‘त्वम्’
पद के वाच्य हैं; किन्तु
इन्द्रियों
से परे स्थित
चैतन्य परमात्मा
ही उसका
लक्ष्यार्थ
है। इसी प्रकार
‘तत्’
पद का
वाच्यार्थ
प्रभुतासम्पन्न, सर्वकर्ता
परमात्मा
है और उसका
लक्ष्यार्थ
सच्चिदानन्दस्वरूप ब्रह्म
है। यहाँ
‘असि’
पद के द्वारा उपर्युक्त दोनों पदों के
लक्ष्यार्थों
के माध्यम से
जीवात्मा
और
ब्रह्म
के
एकत्व
का प्रतिपादन किया गया है।
(वाच्य और लक्ष्य के भेद को समझना प्रत्येक मन्त्र और महावाक्य के यथार्थ प्रयोग तथा अर्थबोध के लिए आवश्यक है।)
कार्य
और
कारण
रूप दो
उपाधियों
के कारण
‘त्वम्’
और
‘तत्’
पदों में भेद का प्रतिपादन किया जाता है। किन्तु
उपाधिरहित
होने पर दोनों ही एक
सच्चिदानन्दस्वरूप
हैं। जगत् में भी
‘यह’
और
‘वह’
— ये दोनों वचन
(यह और वह)
प्रत्येक
देश
और
काल
में प्रयुक्त होते हैं। इनमें से
‘यह’
और
‘वह’
का भेद हटा देने पर एकमात्र
ब्रह्म
ही शेष रहता है। जैसे—
‘वह देवदत्त है’
और
‘यह देवदत्त है’
— इन दोनों वाक्यों में
देवदत्त
एक ही व्यक्ति है।
यह
जीव
कार्यरूप उपाधि
से युक्त है और
ईश्वर
कारणरूप उपाधि
से युक्त है। इन
कार्य
और
कारणरूप उपाधियों
का त्याग कर देने पर केवल
विशुद्ध ज्ञानस्वरूप ब्रह्म
ही शेष रहता है।
शिष्य
(साधक)
को
पूर्ण बोध
तभी प्राप्त हो सकता है, जब वह पहले
गुरु
से उपदेश श्रवण करे, फिर उसका
मनन
करे और तत्पश्चात्
निदिध्यासन
(अनुभूति की साधना)
का अभ्यास करे।
अन्य
विद्याओं
का भली-भाँति प्राप्त किया गया
ज्ञान
निश्चय ही नश्वर है; किन्तु
ब्रह्मविद्या
का यथार्थ रूप से प्राप्त
ज्ञान
ब्रह्मप्राप्ति
कराने में समर्थ होता है।
देव ब्रह्माजी
का वचन है कि
गुरु
को अपने
शिष्य
को
षडङ्गों
से युक्त
महावाक्यों
का उपदेश करना चाहिए; केवल महावाक्य का उपदेश ही नहीं करना चाहिए।
भगवान् शिव
ने
मुनि शुकदेव
से कहा— हे
शुकदेव
! तुम्हारे पिता
वेदव्यासजी
ब्रह्मज्ञानी
हैं। उन्हीं पर प्रसन्न होकर मैंने तुम्हारे प्रति इस
रहस्योपनिषद्
का उपदेश किया है।
इसमें
सच्चिदानन्दस्वरूप ब्रह्म
का उपदेश है, जिसकी प्राप्ति
तप
के द्वारा की जाती है। तुम उस
ब्रह्म
का
चिन्तन
करते हुए
जीवन्मुक्त
(जन्म-मरण के बन्धन-चक्र से मुक्त)
हो जाओगे।
जो
ॐकार
वेदों
के आरम्भ में
स्वररूप
से उच्चरित होता है और जो
वेदान्त
में प्रतिष्ठित है, जो
प्रकृति
में समग्र रूप से लीन होकर भी उससे परे स्थित है, वही
महेश्वर
है।
भगवान् शिव
के इस प्रकार के उपदेश को सुनकर
मुनि शुकदेव
सम्पूर्ण
जगद्रूप परमेश्वर
में तन्मय हो गए। तत्पश्चात् वे उठे,
भगवान्
को हाथ जोड़कर प्रणाम किया और समस्त
परिग्रह
का त्याग करके
(तपोवन की ओर)
प्रस्थान कर गए।
मुनि शुकदेव
को
प्रव्रज्या
के लिए जाते देखकर
श्री वेदव्यासजी
(कृष्ण द्वैपायन मुनि)
को वियोग का दुःख हुआ; किन्तु
मुनि शुकदेव
परब्रह्मरूप सागर
में निर्द्वन्द्व विचरण करने वाले के समान आनन्दमग्न थे।
पुत्र
के वियोग से व्याकुल
श्री वेदव्यासजी
उनके पीछे-पीछे चलते हुए उन्हें पुकारने लगे। उस समय उनकी पुकार का प्रत्युत्तर सम्पूर्ण
जगत्
के
जड़
और
चेतन
पदार्थों ने दिया।
उस प्रत्युत्तर को सुनकर
सत्यवती-पुत्र
मुनि वेदव्यासजी
ने अपने पुत्र को सम्पूर्ण
जगत्
में संव्याप्त जान लिया और
पुत्र
सहित सर्वव्यापक,
अनन्तरूप परब्रह्म
की प्राप्ति कर ली।
जो
साधक
गुरु
के अनुग्रह से इस
रहस्योपनिषद्
के
तत्त्वदर्शन
को जान लेता है, वह समस्त
पापों
से मुक्त होकर साक्षात्
कैवल्य-पद
को प्राप्त होता है। यही
उपनिषद्
(रहस्यात्मक ज्ञान)
है।
Krishjan
धर्म का अन्वेषण
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