मुनि शुकदेव को प्रव्रज्या के लिए जाते देखकर श्री वेदव्यासजी(कृष्ण द्वैपायन मुनि) को वियोग का दुःख हुआ; किन्तु मुनि शुकदेवपरब्रह्मरूप सागर में निर्द्वन्द्व विचरण करने वाले के समान आनन्दमग्न थे।
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