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शुकरहस्य • अध्याय 1 • श्लोक 17
रहस्योपनिषद्ब्रह्म ध्यातं येन विपश्चिता। तीर्थैर्मन्त्रैः श्रुतैर्जप्यैस्तस्य किं पुण्यहेतुभिः॥
जिस तत्त्वदर्शी विचारक ने इस रहस्योपनिषद् में वर्णित ब्रह्म का चिन्तन-मनन कर लिया है, उसके लिए तीर्थ-सेवन, मन्त्र-पाठ, वेद-पाठ तथा जप आदि जैसे पुण्यदायक साधनों का क्या प्रयोजन रह जाता है?
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