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शुकरहस्य • अध्याय 1 • श्लोक 24
त्वंपदमहामन्त्रस्य विष्णुर्ऋषिः। गायत्रीछन्दः। परमात्मा देवता। ऐं बीजम् । क्लीं शक्तिः । सौः कीलकम् । मम मुक्त्यर्थे जपे विनियोगः। वासुदेवाय अङ्गुष्ठाभ्यां नमः। संकर्षणाय तर्जनीभ्यां स्वाहा। प्रद्युम्नाय मध्यमाभ्यां वषट्। अनिरुद्धाय अनामिकाभ्यां हुम्। वासुदेवाय कनिष्ठिकाभ्यां वौषट्। वासुदेवसंकर्षणप्रद्युम्नानिरुद्धेभ्यः करतलकर-पृष्ठाभ्यां फट्। एवं हृदयादिन्यासः। भूर्भुवः सुवरोमिति दिग्बन्धः॥
यहाँ महामन्त्र के त्वम्-पद के ऋषिविष्णु हैं। इसका छन्दगायत्री है। देवतापरमात्मा हैं। बीज‘ऐं’ है। शक्ति‘क्लीं’ है। कीलक‘सौः’ है। मेरी मुक्ति के लिए इस जप का विनियोग है। करन्यास— वासुदेव को नमस्कार है— अँगूठे का स्पर्श। संकर्षण को नमस्कार है— तर्जनी का स्पर्श। प्रद्युम्न को नमस्कार है— मध्यमा का स्पर्श। अनिरुद्ध को नमस्कार है— अनामिका का स्पर्श। वासुदेव को नमस्कार है— कनिष्ठिका का स्पर्श। वासुदेव, संकर्षण, प्रद्युम्न तथा अनिरुद्ध को नमस्कार है— करतल एवं कर-पृष्ठ का स्पर्श। इसी प्रकार हृदयादिन्यास (अङ्गन्यास) का क्रम है। ‘भूर्भुवः स्वः ॐ’— यह दिग्बन्ध है।
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