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शुकरहस्य • अध्याय 1 • श्लोक 31
चतुर्मुखेन्द्रदेवेषु मनुष्याश्वगवादिषु। चैतन्यमेकं ब्रह्मातः प्रज्ञानं ब्रह्म मय्यपि॥
चतुर्मुख ब्रह्मा, इन्द्रदेव, समस्त देवताओं, मनुष्यों, अश्वों, गौओं तथा अन्य सभी प्राणियों में एक ही चैतन्य सत्ताब्रह्म अवस्थित है। वही प्रज्ञान-ब्रह्म मुझमें भी विद्यमान है।
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