वाच्यं लक्ष्यमिति द्विधार्थसरणीवाच्यस्य हि त्वंपदे वाच्यं भौतिकमिन्द्रियादिरपि यल्लक्ष्यं त्वमर्थश्च सः।
वाच्यं तत्पदमीशताकृतमतिर्लक्ष्यं तु सच्चित्सुखानन्दब्रह्म तदर्थ एष च तयोरैक्यं त्वसीदं पदम्॥
महावाक्यों के अर्थ को समझने के लिए उनके वाच्य और लक्ष्य— दोनों अर्थों का अनुसरण करना चाहिए।
वाच्यार्थ के अनुसार भौतिक इन्द्रियाँ आदि भी ‘त्वम्’ पद के वाच्य हैं; किन्तु इन्द्रियों से परे स्थित चैतन्य परमात्मा ही उसका लक्ष्यार्थ है।
इसी प्रकार ‘तत्’ पद का वाच्यार्थ प्रभुतासम्पन्न, सर्वकर्ता परमात्मा है और उसका लक्ष्यार्थसच्चिदानन्दस्वरूप ब्रह्म है।
यहाँ ‘असि’ पद के द्वारा उपर्युक्त दोनों पदों के लक्ष्यार्थों के माध्यम से जीवात्मा और ब्रह्म के एकत्व का प्रतिपादन किया गया है।
(वाच्य और लक्ष्य के भेद को समझना प्रत्येक मन्त्र और महावाक्य के यथार्थ प्रयोग तथा अर्थबोध के लिए आवश्यक है।)
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