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शुकरहस्य • अध्याय 1 • श्लोक 26
असिपदमहामन्त्रस्य मन ऋषिः। गायत्री छन्दः। अर्धनारीश्वरो देवता। अव्यक्ता-दिर्बीजम्। नृसिंहः शक्तिः। परमात्मा कीलकम्। जीवब्रह्मैक्यार्थे जपे विनियोगः। पृथ्वीट्वय-णुकाय अङ्गुष्ठाभ्यां नमः। अब्ट्वयणुकाय तर्जनीभ्यां स्वाहा। तेजोट्वयणुकाय मध्यमाभ्यां वषट्। वायुद्वयणुकाय अनामिकाभ्यां हुम्। आकाशद्वयणुकाय कनिष्ठिकाभ्यां वौषट्। पृथिव्यप्तेजोवाय्वाकाशद्वयणुकेभ्यः करतलकरपृष्ठाभ्यां फट्। एवं हृदयादि न्यासः। भूर्भुवः सुवरोमिति दिग्बन्धः॥
महामन्त्र के ‘असि’ पद के ऋषिमन हैं। इसका छन्दगायत्री है। देवताअर्धनारीश्वर हैं। बीजअव्यक्तादि है। शक्तिनृसिंह हैं। कीलकपरमात्मा हैं। जीव और ब्रह्म के ऐक्य के लिए इस जप का निम्न विनियोग है। करन्यास— पृथ्वी-द्वयणुक को नमस्कार है— अँगूठे का स्पर्श। अप् (जल) द्वयणुक को नमस्कार है— तर्जनी का स्पर्श। तेज (अग्नि) द्वयणुक को नमस्कार है— मध्यमा का स्पर्श। वायु-द्वयणुक को नमस्कार है— अनामिका का स्पर्श। आकाश-द्वयणुक को नमस्कार है— कनिष्ठिका का स्पर्श। पृथ्वी, अप्, तेज, वायु तथा आकाश के द्वयणुकों को नमस्कार है— करतल एवं कर-पृष्ठ का स्पर्श। इसी प्रकार हृदयादि-न्यास का क्रम है। ‘भूर्भुवः स्वः ॐ’— यह दिग्बन्ध है।
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