महामन्त्र के ‘असि’ पद के ऋषि— मन हैं। इसका छन्द— गायत्री है। देवता— अर्धनारीश्वर हैं। बीज— अव्यक्तादि है। शक्ति— नृसिंह हैं। कीलक— परमात्मा हैं।
जीव और ब्रह्म के ऐक्य के लिए इस जप का निम्न विनियोग है।
करन्यास—पृथ्वी-द्वयणुक को नमस्कार है— अँगूठे का स्पर्श।
अप्(जल)द्वयणुक को नमस्कार है— तर्जनी का स्पर्श।
तेज(अग्नि)द्वयणुक को नमस्कार है— मध्यमा का स्पर्श।
वायु-द्वयणुक को नमस्कार है— अनामिका का स्पर्श।
आकाश-द्वयणुक को नमस्कार है— कनिष्ठिका का स्पर्श।
पृथ्वी, अप्, तेज, वायु तथा आकाश के द्वयणुकों को नमस्कार है— करतल एवं कर-पृष्ठ का स्पर्श।
इसी प्रकार हृदयादि-न्यास का क्रम है।
‘भूर्भुवः स्वः ॐ’— यह दिग्बन्ध है।
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