ॐ इस महावाक्य-महामन्त्र के हंस ऋषि हैं, अव्यक्त गायत्री इसका छन्द है, परमहंस इसके देवता हैं, हं इसका बीजमन्त्र है, सः इसकी शक्ति है और सोऽहं इसका कीलक है।
परमहंस देवता की प्रीति के लिए इस महावाक्य का विनियोग किया जाता है।
करन्यास के लिए—ब्रह्म(जो सत्य, ज्ञानमय और अनन्त है) उसे नमस्कार है— अँगूठे का स्पर्श।
ब्रह्म(जो नित्य एवं शाश्वत आनन्दस्वरूप है) उसे नमस्कार है— तर्जनी अँगुली का स्पर्श।
ब्रह्म(जो नित्यानन्दमय है) उसे नमस्कार है— मध्यमा अँगुली का स्पर्श।
जो अतिविस्तृत है (वह ब्रह्म है), उसे नमस्कार है— अनामिका अँगुली का स्पर्श।
जो अतिविस्तृत का भी अधिपति है (वह ब्रह्म है), उसे नमस्कार है— कनिष्ठिका अँगुली का स्पर्श।
ब्रह्म एक और अद्वितीय है, उसे नमस्कार है— करतल एवं कर-पृष्ठ का स्पर्श।
ब्रह्म(जो सत्य, ज्ञानमय एवं अनन्त है) उसे नमस्कार है— हृदय(स्थान) का स्पर्श।
ब्रह्म(जो नित्य आनन्दस्वरूप है) उसे नमस्कार है— सिर का स्पर्श।
ब्रह्म(जो नित्यानन्दमय है) उसे नमस्कार है— शिखा का स्पर्श।
जो विस्तृत है (वह ब्रह्म है), उसे नमस्कार है— दाएँ-बाएँ कन्धों का स्पर्श।
जो विस्तृत का अधिपति है (वह ब्रह्म है), उसे नमस्कार है— दोनों नेत्रों का स्पर्श।
ब्रह्म एक और अद्वितीय है, उसे नमस्कार है— दाएँ हाथ को सिर के ऊपर से घुमाकर बाएँ हाथ पर ताली बजाएँ।
ॐ(परब्रह्म)भूः(भूलोक), भुवः(अन्तरिक्ष) और स्वः(द्युलोक) में संव्याप्त है, उसे नमस्कार है— सभी दिशाओं से रक्षा का विधान।
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