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शुकरहस्य • अध्याय 1 • श्लोक 30
येनेक्षते शृणोतीदं जिघ्रति व्याकरोति च। स्वाद्वस्वादु विजानाति तत्प्रज्ञानमुदीरितम्॥
जिसके द्वारा प्राणी देखता है, सुनता है, सूँघता है, बोलता है तथा स्वाद और अस्वाद का अनुभव करता है, वही प्रज्ञान कहलाता है।
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