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शुकरहस्य • अध्याय 1 • श्लोक 27
जीवो ब्रह्मेति वाक्यार्थं यावदस्ति मनःस्थितिः। ऐक्यं तत्त्वं लये कुर्वन्ध्यायेदसिपदं सदा॥
‘जीव ही ब्रह्म है’— इस महावाक्य के अर्थ पर जो साधक विचार करता है, मन को स्थिर करता है तथा ‘असि’ पद का निरन्तर चिन्तन-मनन करता है, वह तत्त्वों के ऐक्य का साक्षात्कार करने में समर्थ हो जाता है (अर्थात् पंचतत्त्व अन्ततः एकमात्र ब्रह्म में विलीन हो जाते हैं।)
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