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शुकरहस्य • अध्याय 1 • श्लोक 21
अथ महावाक्यानि चत्वारि। यथा ॐप्रज्ञानं ब्रह्म॥ १॥ ॐ अहं ब्रह्मास्मि॥ २ ॥nॐ तत्त्वमसि॥ ३ ॥ ॐ अयमात्मा ब्रह्म॥ ४ ॥ तत्त्वमसीत्यभेदवाचकमिदं ये जपन्ति ते शिवसायुज्यमुक्तिभाजो भवन्ति॥
अब चार महावाक्य दिए जाते हैं— ॐ प्रज्ञानं ब्रह्म (प्रकृष्ट ज्ञान ही ब्रह्म है)ॐ अहं ब्रह्मास्मि (मैं ब्रह्म हूँ)ॐ तत्त्वमसि (वह ब्रह्म तुम ही हो)ॐ अयमात्मा ब्रह्म (यह आत्मा ही ब्रह्म है)। इनमें से ‘तत्त्वमसि’ महावाक्य ब्रह्म के साथ अभेद का प्रतिपादन करता है। जो साधक इसका जप (चिन्तन-मनन) करते हैं, वे भगवान् शिव से सायुज्य-मुक्ति का फल प्राप्त करते हैं।
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