अथ महावाक्यानि चत्वारि। यथा ॐप्रज्ञानं ब्रह्म॥ १॥ ॐ अहं ब्रह्मास्मि॥ २ ॥nॐ तत्त्वमसि॥ ३ ॥ ॐ अयमात्मा ब्रह्म॥ ४ ॥ तत्त्वमसीत्यभेदवाचकमिदं ये जपन्ति ते शिवसायुज्यमुक्तिभाजो भवन्ति॥
अब चार महावाक्य दिए जाते हैं—
ॐ प्रज्ञानं ब्रह्म(प्रकृष्ट ज्ञान ही ब्रह्म है)।
ॐ अहं ब्रह्मास्मि(मैं ब्रह्म हूँ)।
ॐ तत्त्वमसि(वह ब्रह्म तुम ही हो)।
ॐ अयमात्मा ब्रह्म(यह आत्मा ही ब्रह्म है)।
इनमें से ‘तत्त्वमसि’ महावाक्य ब्रह्म के साथ अभेद का प्रतिपादन करता है।
जो साधक इसका जप(चिन्तन-मनन) करते हैं, वे भगवान् शिव से सायुज्य-मुक्ति का फल प्राप्त करते हैं।
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